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'शब्दों का सफर'

Shabdavali

'शब्दों का सफर'

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दिवाली भी शुभ है और दीवाली भी शुभ हो

अजित वडनेरकर, July 25, 2025

चक्कर छोटी ‘इ’, बड़ी ‘ई’ का

क्षेत्रीय प्रभाव

▪हर साल की तरह इस बार भी मित्रों ने दीवाली/दिवाली की वर्तनी के बारे में राय जाननी चाही। किसी से चैट पर, किसी से ईमेल पर, किसी से वाट्सएप पर वॉइस मैसेज और किसी से जीमेल-मैसेंजर के ज़रिए बीते दिनों का जो कुछ भी संवाद मेरे फोन और लैपटाप में था, उसे जोड़ घटा कर यह आलेख बना दिया है। दीवाली/दिवाली की दोनों ही रूप हिन्दी में स्वीकृत भी हैं और सहज भी। आज हम जिस हिन्दी को बरत रहे हैं उस पर भी अनेक क्षेत्रीय प्रभाव हैं जो अलग अलग प्राकृतों से प्रभावित लोकरूपों से आए हैं। मिसाल के तौर पर दीपावली तत्सम रूप है। दीप भी। इसके दिया, दीया, दीपक, दीवा जैसे अनेक रूपभेद हैं।
जनभाषा में दिवाली
▪पंजाबी में दीवा है तो मैथिली में दीया है। यही नहीं, पंजाबी के भी किन्ही इलाक़ों में दीया नज़र आता है। मराठी में दिवा है। ये सब उच्चार लोकग्राह्य हैं। इनकी साहित्यिक स्वीकार्यता भी रही है। यही बात दीवाली, दिवाली के साथ भी है। इतना ही नहीं, शब्दकोशों में दीवाला, दिवाला दोनों रूप भी मिलते हैं। पंजाबी कोशों और अखबारों में दीवाली के साथ दिवाली (ਦਿਵਾਲੀ) रूप दिखाई पड़ता है वहीं जनसामान्य ‘दि/दी’ के फेर में न पड़ते हुए अक्सर दवाल्ली, दुआली बरतना पसंद करता है। इस सन्दर्भ में गुरुवर प्रो. सुरेश वर्मा का कहना है कि मानक हिंदी के लिए ‘ दीवाली’ उपयुक्त है। ‘दिवाली ‘अगले चरण का विकास है। उच्चारण सौकर्य के लिए ‘दी’ ने ‘दि’ के लिए अपना स्थान छोड़ दिया है। जनभाषा में ‘दिवाली’ ने अपना popular space बना रखा है।
ह्रस्वीकरण की सहज वृत्ति
▪दीप से बने शब्दरूपों में ह्रस्वीकरण की सहज वृत्ति काम करती रही है। मिसाल के तौर पर अवधी में दिअटि शब्द है। यह वही है जिसे राजस्थानी समेत हिन्दी के अनेक क्षेत्रों में दीवट के तौर पर जाना जाता है। दीवट भी दिया रखने के स्टैंड को कहते हैं। दीवट अपने आप में दीया भी है जिसमें बाती जलाई जाती है। दीयट, दीअट भी इसके अन्य समरूप हैं। भाषाविदों ने इसका मूल दीपस्थ माना है अर्थात लैम्पस्टैंड या दीपाधार। प्राकृत में यह दीवट्ठ है मगर अगला विकास दिअठ ह्रस्वीकरण के साथ सामने आता है। दिया रखने का आला दिअरखा कहलाता है। यह पूरबी बोलियों में प्रयुक्त होता है। दीवार में बनी दीप रखने की जगह। भाव लैम्पस्टैंड का है। ऐसे अनेक उदाहरण मिलेंगे। जैसे दीपक, दीया के लिए दिअना, मिट्टी के छोटे दीप के लिए दिअली और दिउला। इसी तरह मालवी, राजस्थानी में दीवड़ा, दीवड़ौ छोटा दीपक है। गौर करें तत्सम रूप में ही दीप के ‘दी’ में दीर्घस्वर बना रहता है। जैसे ही ‘दीप’ लोकवृत्त में आता है, उसमें दियरा, दियला, दियवा, दिवरी और दियली जैसे पर्याय दिप-दिपाने लगते हैं।
अरण्डी का तेल
▪दूर क्यों जाएँ, अभी दो दशक पहले तक तक दिट्ठी, दीठी अथवा दिखना, दीखना पर समाचार कक्षों में सही वर्तनी और उच्चार पर अनुमान लगाए जाते थे। यह सकारात्मक और बहुत अच्छी बात थी। दीप की कड़ी में ही दीप्त है। इसका एक रूप दित्त है। दीप्ति का रूप अवधी में दिपति हो जाता है। ह्रस्वीकरण प्रभावी हो रहा है। दिपना, दिपाना भी बेहद आम से शब्द हैं जो दीपन् से आ रहे हैं। दीपक रखने के स्थान को ‘दियरखा’ भी कहते हैं। गुजराती में अरण्डी को ‘दिवेला’ भी कहते हैं। यह दरअसल दिवेल अर्थात दीवौ (दीप) + तैल(तेल) से बना है। अरण्डी की फसल का उपयोग तेल बनाने में ही किया जाता है। पुराने दौर में जब बिजली सुलभ नहीं थी, इस तेल का उपयोग दिया व प्रकाशित करने वाले अन्य उकरणों में किया जाता था।
दिपावली भी और दीपावली भी
▪गुजराती में भी दीपावली से विकसित दिवाळी रूप प्रचलित हैं। मगर सबसे दिलचस्प बात यह कि वहाँ दीपोत्सव के सबसे लोकमान्य रूप दीपावली का दिपावली रूप भी दिखता है। गुजराती की सबसे प्रतिष्ठित भगवद्गोमंडल कोश में दिपावली भी प्रयुक्त हुआ है। मराठी कोशों में और भी हैरत में डालने वाली प्रविष्टियाँ मिलेंगी। वहाँ न सिर्फ़ दीपावली का दिपावळी रूप भी दर्ज है बल्कि इसका एक अन्य समरूप दिपवाळी भी ठाठ से हाज़िर है। यही नहीं, दिपवाळीचा पाडवा या दिपावळिची प्रतिपदा जैसी व्याख्या भी देखने को मिलती है। यूँ देखें तो मराठी में दीपावली का दीपावळी रूप देखने को नहीं मिलता बल्कि वहाँ एक तीसरा ही रूप दिपावळि चलता है। इसके अतिरिक्त दिवाळी सबसे ज्यादा प्रचलन में है। इसके अलावा दीपपर्व की तर्ज पर दिवाळ-सण का बरताव भी खूब होता है।
दियासलाई का ‘दीया’
▪दियासलाई की मिसाल देखिए। इस शब्द के प्रथम सर्ग दिया पर कभी बहस नहीं होती। दीयासलाई को सही बताते हुए दियासलाई पर कुढ़ते कभी किसी को देखा नहीं गया। याद करें, नामी शब्दकोश इसकी व्युत्पत्ति दीया+सलाई लिखते हैं। ये हैरत की बात नहीं है कि दीया और सलाई के मेल से दीयासलाई शब्द बनना चाहिए या दियासलाई ? जो कोशकार दीया+सलाई से बने दियासलाई के चलन पर मौन रहते हैं, वही दीवाली के सम्मुख दिवाली को गलत ठहराते हैं, मगर तर्क नहीं देते। जबकि दियासलाई और दिवाली दोनों के मूल में दीप ही जगमगा रहा है। कुछ विद्वान दिवाली को इसलिए ग़लत ठहराते हैं क्योंकि यह दिवाला से जुड़ता सा लगता है। दिवाला एक दुर्भाग्यपूर्ण और अशुभ प्रसङ्ग है इसलिए दीवाली जैसे सुख-समृद्धि के पर्व दीवाली की वर्तनी में हम दिवाला का ह्रस्व ‘दि’ नहीं देखना चाहते। अन्यथा कोशों में दिवाली और दीवाली के साथ दीवाला और दिवाला दोनों मिलते हैं। क्योंकि दोनों में दीप के लोकरूप दिवा और दीवा ही हैं।
मानक के साथ सरल भी
▪आम आदमी ‘दिया’ और ‘दीया’ रूप समान भाव से बरतता है। पूरबी बोलियों में दीया प्रचलित है जबकि मध्य और पश्चिमी भारत में दिया चलता है। अलबत्ता पंजाबी में दीवा है और मराठी में दिवा और राजस्थानी में ह्रस्व और दीर्घ दोनों ही रूप प्रचलित हैं। अर्थात दिवौ, दीवौ और दिवलौ, दीवलौ दोनों ही प्रकाशमान हैं। दीवाली, दिवाली के अलावा एक अन्य रूप दिवारी भी है। मगर विद्वत समाज में उसे दीवारी करने सम्बन्धी आग्रह कभी नहीं देखा गया। वजह लिखत-पढ़त की हिन्दी में, ख़ासतौर पर संचार माध्यमों में दिवाली और दीवाली ही अधिक बरते जाते हैं। यह बार बार साबित होता है कि जनभाषा सरल राह चुनती है। परिनिष्ठित या मानक होने की चाहत गलत नहीं किन्तु भाषा को दुरूह होने से बचाना किसी भी जनञ्चार माध्यम के लिए सबसे बड़ी चुनौती है।
हर मर्ज़ की एक दवा
▪भाषा का मानकीकरण आवश्यक है मगर क्या इसका अर्थ यह है कि किसी भी शब्द का कोई एक मानक रूप ही स्वीकार्य होगा? सर्दी, खाँसी, सिरदर्द दूर करने के अनेक निदान हैं मगर इन सब पर्यायों में से कोई एक उपचार ही स्थिर कर दिया जाए तो क्या यह सही होगा ? जब तक दवा नहीं मिल जाती तब तक राहत की उम्मीद में सिर पर पट्टी बांधी जाती है या नहीं ? मानकीकरण में भी इस तरह के दुराग्रहों से बचने की आवश्यकता है। हिन्दी का क्षेत्र बहुत विशाल है। तरह तरह की हिन्दियाँ लिखी-बोली जाती रही हैं। दिवाली और दीवाली से यह स्पष्ट है। दोनों में ही दियों की अवली यानी दीपों की कतार दिखती है, कोई और चीज़ नहीं।
पङ्क्तिपावन और पङ्क्तिच्युत
▪दिलचस्प यह कि जिस तरह तत्सम दीप के अनेक रूपभेद दिखाई पड़ते हैं, हिन्दी कोशों में अवलि, अवली, आवली तथा औली जैसे रूपों का भी उल्लेख होता है। इऩ सबमें ही कतार, पङ्क्ति, श्रेणी, लाइन, तरतीब, माला या अनुक्रम का आशय स्पष्ट है। इसी तरह संस्कृत में भी अवली और आवली, आवलि दोनों रूप हैं। औली तो प्रत्ययरूप में स्थापित होकर मण्डौली, सिधौली, खतौली, बिजौली, अतरौली, महरौली में स्थायी हो गए हैं। राजस्थानी में यह अवळी है। मानक रूप तय करते हुए किसी एक उच्चार को पङ्क्तिपावन बताते हुए शेष जिन उच्चारों (शब्दों) को पङ्क्तिच्युत किया जाएगा तब उनके क्या दोष गिनाए जाएँगे, यह जानना दिलचस्प होगा। पता नहीं गिनाए भी जाएँगे या नहीं।
अनेक शब्दरूप समस्या नहीं
▪किन्हीं शब्दों की अनेक वर्तनियाँ और उच्चार किसी भाषा की समस्या नहीं, गुण माना जाना चाहिए। अलबत्ता सरकारी कामकाज या संस्थागत व्यवहार की कोई न कोई मानक शब्दावली ज़रूर होती है। उस नाते दिवाली या दीवाली दोनों में से कोई एक रूप अपनाना बेहतर होगा। ध्यान रहे यह बाता अखबारों पर अधिक लागू होती है। ख़ासतौर पर किसी सूचना-विज्ञप्ति, साक्षात्कार अथवा आलेख में किसी एक शब्दरूप को ही बरता जाए। समूचे अखबार में भी कोशिश रहे कि किसी एक वर्तनी को स्थिर किया जाए, मगर ऐसा न हो पाने को दोष या चूक न माना जाए। यह उन विभागों, संस्थानों या समूहों को तय करना है कि वे इस सूची में किन शब्दों को बरतना चाहते हैं।
अर्थविचलन को पहचानें
▪सर्वस्वीकृत और लोक में प्रचलित एकाधिक रूपों पर किसी तरह खींचतान कर व्याकरण के खाँचे में कसने और एक को सही, दूसरे को अशुद्ध़ करार देने की कवायद व्यर्थ होगी। सन्दर्भ दीवाली/दिवाली का ही है। व्यक्तिगत स्तर पर मेरी कोशिश होती है कि दीवाली लिखूं मगर विचार-प्रवाह में अगर दिवाली लिखने में आता है तो उसे मिटाता भी नहीं हूँ। क्योंकि दोनों ही सही हैं और भाषिक परम्परा में हैं। रूढ़ हैं। भाषा प्रवाह में बहते हुए घिसते हुए अपने अनेक रूपाकारों में हमारी शब्दमञ्जूषा में आज तक टिके हुए हैं। हाँ, ह्रस्व या दीर्घ होने पर अर्थविचलन होने का कोई तर्क हो तो अलग बात है। ये वैविध्य इसीलिए है क्योंकि शब्दों को अपनी अभिव्यक्ति के अनुरूप ढालते हुए उसमें बदलाव के उपकरण भी हमारे पास होते हैं। छन्दप्रबन्ध करते हुए प्रचलित शब्दों में ह्रस्व-दीर्घ का बदलाव करना बहुत सामान्य बात रही है।
मानकीकरण की चुनौतियाँ
▪भाषाओं में ह्रस्वीकरण या दीर्घीकरण की वृत्ति होना बहुत सहज बात है। और भी अनेक कारण हैं जिनके चलते भाषा में टिके रहने का गुण पैदा होता है। इसीलिए भाषा बदलती रहती है। देश भर में हिन्दी की अनेक शैलियाँ हैं और वे सब समझी-गुनी जाती हैं। दिवाली का जिक्र आने पर कितने लोगों के मन में “खराद के पट्टे” की छवि उपस्थित हो जाती होगी ? यह भी जानना दिलचस्प होगा कि क्या इसी खरादपट्टे की वजह से जानकारों की राय में दिवाली लिखना उचित नहीं? जबकि ‘दिवाली’ को दीपपर्व रूप में बरते जाने के अनगिनत प्रमाणों ने ही इसे आज तक लक्ष्मीपूजन से जोड़े रखा है। दिवाले का अपशकुन इसे बरतने के आड़े नहीं आता। और अन्त में आरम्भ की बात दोहराता चलूँ- दिवाली भी शुभ है और दीवाली भी शुभ हो।
▪और चलते चलते
यह भी महत्वपूर्ण है कि सर्च बॉक्स में ‘दिवाली’ लिखने पर गूगल एक पल से भी कम समय में तीन करोड़ से भी अधिक नतीजे दिखाता है जबकि उतने ही समय में ‘दीवाली’ के लिए सिर्फ़ चालीस लाख नतीजे दिखाता है। इसका आशय गलत वर्तनी को मान्यता नहीं बल्कि प्रयोक्ताओं की संख्या बताना है।
असम्पादित
Author Admin अजित वडनेरकर

Gender Male
Industry Publishing
Occupation मीडिया
Location भोपाल, मध्यप्रदेश, India
Introduction बीते 30 वर्षों से पत्रकारिता। प्रिंट व टीवी दोनों माध्यमों में कार्य।
Interests इतिहास के दायरे में आनेवाली सारी बातें, किताबें पढ़ने से लेकर शब्द-विलास तक सबकुछ, पर्यावरण संरक्षण, फोटोग्राफी, मानचित्र-पर्यटन, बहस ...
Favorite movies राजकपूर की सभी फिल्में, गाईड तीसरी कसम
Favorite music मालवी-राजस्थानी लोकगीत, शास्त्रीय-उपशास्त्रीय संगीत । वेस्टर्न क्लासिकल । जिप्सी संगीत ।
Favorite books हजारीप्रसाद द्विवेदी, भगवतीचरण वर्मा, प्रेमचंद, अमृतलाल नागर, सआदत हसन मंटो की सभी पुस्तकें । देवकीनंदन खत्री से लेकर सुरेन्द्रमोहन पाठक तक । यह सूची काफ़ी लम्बी है ।

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किताब में सफर- दूसरा खण्ड

आपके प्रिय ब्लॉग-शब्दों का सफ़र के शोधपूर्ण आलेख अब पुस्तकाकार भी उपलब्ध हैं। पहला खण्ड 2011 में प्रकाशित हुआ था और 2012 में दूसरा खण्ड भी राजकमल प्रकाशन से प्रकाशित हो चुका है । सफ़र में अब तक विभिन्न भाषाओं से हिन्दी में समाए उन सैकड़ों शब्दों की व्युत्पत्ति और विवेचना संबंधी दिलचस्प ब्योरा है जिनके जरिये हिन्दी के शब्दभंडार में कई गुना ज्यादा इज़ाफ़ा हुआ है ।सफ़र का दूसरा पड़ाव

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आमदरफ्त

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सफर खुद की तलाश का

उत्पत्ति की तलाश में निकलें तो शब्दों का बहुत दिलचस्प सफर सामने आता है। लाखों सालों में जैसे इन्सान ने धीरे -धीरे अपनी शक्ल बदली, सभ्यता के विकास के बाद से शब्दों ने धीरे-धीरे अपने व्यवहार बदले। एक भाषा का शब्द दूसरी भाषा में गया और अरसे बाद एक तीसरी ही शक्ल में सामने आया। -
एक निवेदन- शब्द की तलाश दरअसल अपनी जड़ों की तलाश जैसी ही है।शब्द की व्युत्पत्ति को लेकर भाषा विज्ञानियों का नज़रिया अलग-अलग होता है। मैं न भाषा विज्ञानी हूं और न ही इस विषय का आधिकारिक विद्वान। जिज्ञासावश स्वातःसुखाय जो कुछ खोज रहा हूं, पढ़ रहा हूं, समझ रहा हूं ...उसे आसान भाषा में छोटे-छोटे आलेखों में आप सबसे साझा करने की कोशिश है।अजित वडनेरकर

भोपाल, मध्यप्रदेश, India

बीते 30 वर्षों से पत्रकारिता। प्रिंट व टीवी दोनों माध्यमों में कार्य।


आपका शुक्रिया

उदय प्रकाश
बहुत शोधपरक, उपयोगी और महत्वपूर्ण जानकारियां। हिंदी में इतनी संलग्नता के साथ ऐसा परिश्रम करने वाले विरले ही होंगे।
अशोक पाण्डे
'शब्दों का सफर' मुझे व्यक्तिगत रूप से हिन्दी का सबसे समृद्ध और श्रमसाध्य ब्लॉग लगता रहा है।

अरविंदकुमार

मैं ने पहली बार आप का ब्लाग पढ़ा-पशु और फ़ीस वाला। बधाई!अब इसे फ़ेवरिट की सूची में डाल लिया है। लगातार ज़ारी रखें..
अभय तिवारी
आप के समर्पण और लगन के लिए मेरे पास ढेर सारी प्रशंसा है और काफ़ी सारी ईर्ष्या भी।

डॉ चंद्रकुमार जैन

सच कहूँ ,ब्लॉग-जगत का सूर और ससी ही है शब्दों का सफ़र . बधाई.... अंतर्मन से

शास्त्री जे सी फिलिप
लिखते रहें. यह मेरे इष्ट चिट्ठों मे से एक है क्योंकि आप काफी उपयोगी जानकारी दे रहे हैं.

संजय पटेल
थोड़े में कितना कुछ कह जाते हैं आप. आपके ब्लाँग का नियमित पारायण कर रहा हूं और शब्दों की दुनिया से नया राब्ता बन रहा है.

शिरीष कुमार मौर्य
आपकी मेहनत कमाल की है। आपका ये ब्लॉग प्रकाशित होने वाली सामग्री से अटा पड़ा है - आप इसे छपाइये !
हर्षदेव
मुझे सबसे उल्लेखनीय बात लगती है, पहले से ही सजीली भाषा में अभिव्यक्ति और अर्थवत्ता के अनोखे गुण का विकास। आपके ब्लॉग में रोचकता भी है और सूचनारंजन भी।

मंसूर अली हाशमी
ऐसे समय में जब कुछ लोग भाषाओ और शब्दों को धर्म से जोड़ कर देखने लगे है, शब्दों के सफर में धर्म, समाज और देशो के दायरों को तोड़ते हुए, भाषाई रिश्तों की यह पड़ताल अमूल्य है।

शृद्धा जैन

आप जाने कहाँ कहाँ से इतनी अनमोल जानकारी ढूँढ लाते हैं और आपके ब्लॉग पर आना सार्थक हो जाता है।लिखते रहे आप बहुत अलग, बहुत प्रभावशाली है।
अनूप शुक्ल
बेहतरीन उपलब्धि है आपका ब्लाग! मैं आपकी इस बात की तारीफ़ करता हूं और जबरदस्त जलन भी रखता हूं कि आप अपनी पोस्ट इतने अच्छे से मय समुचित फोटो ,कैसे लिख लेते हैं.

सोमाद्रि
लोग पूछते है - ऐसा क्या है शब्दावली में? मेरा, कहना है अगर आप पढोगे, तो जानोगे। मेरा शब्दों के प्रति ज्ञान बढाने में आपके इस ब्लॉग का बहुत बड़ा हाथहै।

समीरलाल

इस सफर में आकर सब कुछ सरल और सहज लगने लगता है। बस, ऐसे ही बनाये रखिये. आपको शायद अंदाजा न हो कि आप कितने कितने साधुवाद के पात्र हैं.
लावण्या शाह
बिल्कुल अलग है आपका ब्लाग, सबसे अलग। इसकी हर पोस्ट अपने आप में विशिष्ट होती है. शुभकामनाएं.
अरविंद मिश्रा
शब्दों का सफर मेरी सर्वोच्च बुकमार्क पसंद है -मैं इसे नियमित पढ़ता हूँ और आनंद विभोर होता हूँ !आपकी ये पहल हिन्दी चिट्ठाजगत मे सदैव याद रखी जायेगी.

प्रभाकर पाण्डेय
पता नहीं भविष्य में चिट्ठों का अस्तित्व रहे या ना रहे पर "शब्दों का सफर" शोधार्थियों एवं हिन्दी प्रेमियों के लिए प्रेरक बना रहेगा।
विष्णु बैरागी
भाषिक विकास के साथ-साथ आप शब्‍दों के सामाजिक योगदान और समाज में उनके स्‍थान का वर्णन भी बडी सुन्‍दरता से कर रहे हैं।आपको पढना सुखद लगता है।
पंकज श्रीवास्तव
आपकी मेहनत को कैसे सराहूं। बस, लोगों के बीच आपके ब्लाग की चर्चा करता रहता हूं। आपका ढिंढोरची बन गया हूं। व्यक्तिगत रूप से तो मैं रोजाना ऋणी होता ही हूं.
ज्ञानदत्त पांडे
आपकी पोस्ट पढ़ने में थोड़ा धैर्य दिखाना पड़ता है. पर पढ़ने पर जो ज्ञानवर्धन होताहै,वह बहुत आनन्ददायक होता है.
रवि रतलामी
किसी हिन्दी चिट्ठे को मैं ब्लागजगत में अगर हमेशा जिन्दा देखना चाहूंगा, तो वो यही होगा-शब्दों का सफर.
विजय गौर
निश्चित ही हिन्दी ब्लागिंग में आपका ब्लाग महत्वपूर्ण है. जहां भाषा विज्ञान पर मह्त्वपूर्ण जानकारी उपलब्ध रह्ती है.

बालेंदु दाधीच
आपने सिद्ध किया है कि तकनीक का सार्थक प्रयोग कैसे होता है ... बिना स्पष्ट लाभ के मोटीवेशन कायम रखते हुए स्थायी महत्व का कार्य कैसे किया जा सकता है.
Dr.bhoopendra
good,innovative explanation of well known words look easy but it is an experts job.My heartly best wishes.


आशीर्वचन

डॉ सुरेश वर्मा

अजित वडनेरकर अपने विश्लेषण में व्युत्पत्तिशास्त्र के समस्त संभव प्रतिमानों का उपयोग करते हैं। वे सावधानी के साथ लोकव्यवहार में प्रचलित उन शब्दों का चयन करते हैं, जिनके अर्थ को लेकर लोकमानस में जिज्ञासा हो सकती हो। फिर वे उस शब्द की धातु, उस धातु के अर्थ और अर्थ की विविध भंगिमाओं तक पहुँचते हैं। फिर वे समानार्थी शब्दों की तलाश करते हुए विविध कोनों से उनका परीक्षण करते हैं. फिर उनकी तलाश शब्द के तद्भव रूपों तक पहुंचती है और उन तद्बवों की अर्थ-छायाओं में परिभ्रमण करती है। फिर अजित अपने भाषा-परिवार से बाहर निकलकर इतर भाषाओँ और भाषा-परिवारों में जा पहुँचते हैं। वहां उन देशों की सांस्कृतिक पृष्टभूमि में सम्बंधित शब्द का परीक्षणकर, पुनः समष्टिमूलक वैश्विक परिदृश्य का निर्माण कर देते हैं। यह सब रचनाकार की प्रतिभा और उसके अध्यवसाय के मणिकांचन योग से ही संभव हो सका है। व्युत्पत्तिविज्ञान की एक नयी और अनूठी समग्र शैली सामने आई है।
[डॉ.सुरेश वर्मा ख्यात भाषाविद् हैं। मुझे इनके मार्गदर्शन में अध्ययन करने का अवसर मिला है।]


सफर के पड़ाव


सफर की चर्चा यहां भी

सफर की चर्चा यहां भी

मेल टुडे में शब्दों का सफर

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....यूं शुरू हुई शब्द यात्रा

अनूपजी की चिट्ठाचर्चा

बनारसी पाती

अभय की प्यारी पोस्ट

शुक्रिया अरविंदकुमार जी
लिंकित मन में
सृजन सम्मान
Dick & Garlick


चर्चा इधर भी

हिंदी में शब्दों की खोज लगभग खत़्म हो गयी है. लेखक इस ज़रूरत से उठ गये हैं कि उनकी अभिव्यक्ति के पन्नों को नये शब्द कुछ रोशनी बिखेर सकते हैं. बल्कि जाने हुए शब्दों के जरिये कहानी और कविता के सीमित शिल्प को सरल समय का आईना कह कर वे नये शब्दों की ज़रूरत को खारिज़ तक कर देते हैं. लेकिन ब्लॉग्स में भूले हुए शब्दों को खोजने और कई मौजूदा शब्दों की जड़ों तक पहुंचने का काम कुछ लोग कायदे से कर रहे हैं. अजित वाडनेकर ऐसे ही एक सिपाही हैं, जो शब्दों का सफ़र (http://shabdavali.blogspot.com/) नाम से अपना ब्लॉग चलाते हैं. उनके बारे में जानकारी अभय तिवारी के निर्मल आनंद से मिली. उन्होंने लिखा- पाया ब्लॉग जगत ने एक नया नगीना. आगे लिखा, 'वे हिंदी भाषा के संसार में एक मौलिक काम कर रहे हैं. शब्दों को उनके मूल में जाकर जांच परख रहे हैं. देशकाल और विभिन्न समाजों में उनकी यात्रा को खोल रहे हैं.` इतना काफी था हमें किसी ब्लॉग के बारे में उत्सुक करने के लिए. हम जब वहां पहुंचे, तो सचमुच ताज़ा रचनात्मकता की शीतल बूंदें वहां मोतियों की तरह बिखरी थीं. ब्लॉग पर अपने सफ़र का आगा़ज़ वे कुछ इस तरह करते हैं, 'उत्पत्ति की तलाश में निकलें, तो शब्दों का बहुत ही दिलचस्प सफ़र सामने आता है. लाखों सालों में जैसे इंसान अपनी शक्ल बदली, सभ्यता के विकास के बाद से शब्दों ने भी अपने व्यवहार बदले. एक भाषा का शब्द दूसरी में गया और अरसे बाद एक तीसरी ही शक्ल में प्रचलित हुआ.` आप अगर शब्दावली के पन्ने पलटेंगे, तो पाएंगे कि अजित वडनेरकर ग्राम, गंवार और संग्राम के बीच के अंतर्संबंधों की व्याख्या कर रहे हैं. बगातुर और बघातुर से होते हुए बहादुर तक पहुंच रहे हैं. कुली से कुल की पहचान कर रहे हैं... और आरोही और रूहेलखंड के अर्थों में कुछ सम खोज रहे हैं. लेकिन ऐसा नहीं है कि सब कुछ एकतरफा ही परोसा जा रहा है. हिंदी में शब्दों पर कम कश्मकश इधर देखने को मिले हैं, लेकिन ब्लॉग पर अजित वडनेकर से दो-दो हाथ करने वाले बहुतायत में हैं. एक का ज़िक्र यहां करते हैं. बजरबट्टू के बारे में अजित वडनेकर ने लिखा, 'प्राचीनकाल में गुरुकुल के विद्यार्थी के लिए ही आमतौर पर वटु: या बटुक शब्द का प्रयोग किया जाता था. राजा-महाराजाओं और श्रीमंतों के यहां भी ऋषि-मुनियों के साथ ये वटु: जो उनके गुरुकुल में अध्ययन करते थे, जाते और दान पाते. बजरबट्टू भी बटुक से ही बना. बजरबट्टू आमतौर पर मूर्ख या बुद्धू को कहा जाता है. जिस शब्द में स्नेह-वात्सल्य जैसे अर्थ समये हों, उससे ही बने एक अन्य शब्द से तिरस्कार प्रकट करने वाले भाव कैसे जुड़ गये? आश्रमों में रहते हुए जो विद्यार्थी विद्याध्ययन के साथ-साथ ब्रह्मचर्यव्रत के सभी नियमों का कठोरता से पालन करता, उसे वज्रबटुक कहा जाने लगा. जाहिर है वज्र यानी कठोर और बटुक मतलब ब्रह्मचारी/विद्यार्थी. ये ब्रह्मचारी अपने गुरु के निर्देशन में वज्रसाधना करते, इसलिए वज्रबटुक कहलाये. मगर सदियां बीतने पर जब गुरुकुल और आश्रम परंपरा का ह्रास होने लगा, तब बेचारे इन बटुकों की कठोर वज्रसाधना को भी समाज ने उपहास और तिरस्कार के नजरिये से देखना शुरू किया और अच्छा-खासा वज्रबटुक हो गया बजरबट्टू यानी मूर्ख.` लेकिन अभय तिवारी ने बजरबट्टू के इस संधान पर संदेह किया. साफ है कि शब्दों के संधान को लेकर अलग अलग आग्रह और व्याख्याएं और सूचनाएं ब्लॉग पर तुरत-फुरत एक दूसरे तक पहुंच जाती हैं, और सफ़र को आगे जारी रखने में मदद मिलती है. अभय तिवारी ने प्रतिवाद किया, 'बजरबट्टू शब्द का लोकप्रिय प्रयोग बुरी नज़र से बचाने वाले एक पत्थर के अर्थ के बतौर है. रामशंकर शुक्ल 'रसाल` के भाषा शब्दकोश में भी बजरबट्टू का अर्थ है- एक पेड़ का बीज जिसे दृष्टिदोष से बचाने के लिए बच्चों को पहनाते हैं. बजर तो साफ़ साफ़ वज्र का तद्भव है, मगर बट्टू क्या है? क्या वट? क्या वटन? या वटक?` और इस तरह एक नया भाषा विमर्श शुरू होता है, जिसमें हिंदी के कवि बोधिसत्व भी कूदते हैं. अपने ब्लॉग विनय पत्रिका में वे लिखते हैं, 'संदर्भ बजर का हो या बट्टू का, पर आप अपने बटुए को न भूलें. नहीं तो आप के हाथ से साबुन की बट्टी लेकर कोई और अपनी किस्मत चमकाएगा. फिर आप को बटुर (सिकुड़) कर रहना पड़ेगा और इसमें ठाकुर जी का बटोर (हजारी प्रसाद द्विवेदी) करने से भी कोई फायदा नहीं होगा. और आप धूल बटोरने में उम्र बिता देंगे. अच्छा हो कि यह बट्टा बन कर किसी भाव न गिरा दें जैसे कि आज कल कइयों का गिरा है.` बजरबट्टू की इस पूरी बहस में कुल २९ बार लोग एक दूसरे से आपस में उलझे. अजित वडनेकर की पोस्ट पर चार टिप्पणियां दर्ज हैं, अभय तिवारी की पोस्ट पर बीस टिप्पणियां और बोधिसत्व की पोस्ट पर पांच टिप्पणियां दर्ज हैं. इस पूरी बहस में लंदन से अनामदास के साथ अनूप शुक्ला, इरफ़ान, अफलातून, काकेश, प्रियंकर, प्रमोद सिंह ने हिस्सा लिया. और भी कई नाम हैं, जिन्होंने अपनी बात रखी. सवाल असहमतियों के लोकतांत्रिक गंठजोड़ का जितना है, उससे कहीं अधिक जिसके पास जितनी चीज़ें हैं, वे आपस में साझा कर रहे हैं. नवभारत टाइम्स और दैनिक भास्कर जैसे अखब़ारों और दूरदर्शन, ज़ी न्यूज़, आजतक और स्टार न्यूज़ के साथ काम करते हुए अजित वडनेरकर पिछले बाइस सालों से पत्रकारिता कर रहे हैं. इतिहास और संस्कृति से उनका गहरा लगाव है, लेकिन ये अखब़ार आज जो उनका पेशा है, उसमें किसी काम का नहीं. लेकिन जो है, उसे समेटना है, बांटना है और ब्लॉग इसके लिए उन्हें सबसे सटीक माध्यम लगा. --अविनाश [लेखक का ब्लाग है http://mohalla.blogspot.com/ ]

चर्चा हिन्दुस्तान में

शब्दों के प्रति लापरवाही से भरे इस दौर में हर शब्द को अर्थविहीन बनाने का चलन आम हो गया है। इस्तेमाल किए जाने भर के लिए ही शब्दों का वाक्यों के बाच में आना जाना हो रहा है, खासकर पत्रारिता ने सरल शब्दों के चुनाव क क्रम में कई सारे शब्दों को हमेशा के लिए स्मृति से बाहर कर दिया। जो बोला जाता है वही तो लिखा जाएगा। तभी तो सर्वजन से संवाद होगा। लेकिन क्या जो बोला जा रहा है, वही अर्थसहित समझ लिया जा रहा है ? उर्दू का एक शब्द है खुलासा । इसका असली अर्थ और इस्तेमाल के संदर्भ की दूरी को कोई नहीं पाट सका। इसीलिए बीस साल से पत्रकारिता में लगा एक शख्स शब्दों का साथी बन गया है। वो शब्दों के साथ सफर पर निकला है। अजित वडनेरकर। ब्लॉग का पता है http://shabdavali.blogspot.com दो साल से चल रहे इस ब्लॉग पर जाते ही तमाम तरह के शब्द अपने पूरे खानदान और अड़ोसी-पड़ोसी के साथ मौजूद होते हैं। मसलन संस्कृत से आया ऊन अकेला नहीं है। वह ऊर्ण से तो बना है, लेकिन उसके खानदान में उरा (भेड़), उरन (भेड़) ऊर्णायु (भेड़), ऊर्णु (छिपाना)आदि भी हैं । इन तमाम शब्दों का अर्थ है ढांकना या छिपाना। एक भेड़ जिस तरह से अपने बालों से छिपी रहती है, उसी तरह अपने शरीर को छुपाना या ढांकना। और जिन बालों को आप दिन भर संवारते हैं वह तो संस्कृत-हिंदी का नहीं बल्कि हिब्रू से आया है। जिनके बाल नहीं होते, उन्हें समझना चाहिए कि बाल मेसोपोटामिया की सभ्यता के धूलकणों में लौट गया है। गंजे लोगों को गर्व करना चाहिए। इससे पहले कि आप इस जानकारी पर हैरान हों अजित वडनेरकर बताते हैं कि जिस नी धातु से नैन शब्द शब्द का उद्‌गम हुआ है, उसी से न्याय का भी हुआ है। संस्कृत में अरबी जबां और वहां से हिंदी-उर्दू में आए रकम शब्द का मतलब सिर्फ नगद नहीं बल्कि लोहा भी है। रुक्कम से बना रकम जसका मतलब होता है सोना या लोहा । कृष्ण की पत्नी रुक्मिणी का नाम भी इस रुक्म से बना है जिससे आप रकम का इस्तेमाल करते हैं। ऐसे तमाम शब्दों का यह संग्रहालय कमाल का लगता है। इस ब्लॉग के पाठकों की प्रतिक्रियाएं भी अजब -गजब हैं। रवि रतलामी लिखते हैं कि किसी हिंदी चिट्ठे को हमेशा के लिए जिंदा देखना चाहेंगे तो वह है शब्दों का सफर । अजित वडनेरकर अपने बारे में बताते हुए लिखते हैं कि शब्द की व्युत्पत्ति को लेकर भाषा विज्ञानियों का नज़रिया अलग अलग होता है। मैं भाषाविज्ञानी नहीं हूं, लेकिन जज्बा उत्पति की तलाश में निकलें तो शब्दों का एक दिलचस्प सफर नजर आता है। अजित की विनम्रता जायज़ भी है और ज़रूरी भी है क्योंकि शब्दों को बटोरने का काम आप दंभ के साथ तो नहीं कर सकते। इसीलिए वे इनके साथ घूमते-फिरते हैं। घूमना-फिरना भी तो यही है कि जो आपका नहीं है, आप उसे देखने- जानने की कोशिश करते हैं। वरना कम लोगों को याद होगा कि मुहावरा अरबी शब्द हौर से आया है, जिसका अर्थ होता है परस्पर वार्तालाप, संवाद । शब्दों को लेकर जब बहस होती है तो यह ब्लॉग और दिलचस्प होने लगता है। दिल्ली से सटे उत्तर प्रदेश के नोएडा का एक लोकप्रिय लैंडमार्क है- अट्टा बाजार। इसके बारे में एक ब्लॉगर साथी अजित वडनेरकर को बताता है कि इसका नाम अट्टापीर के कारण अट्टा बाजार है, लेकिन अजित बताते हैं कि अट्ट से ही बना अड्डा । अट्ट में ऊंचाई, जमना, अटना जैसे भाव हैं, लेकिन अट्टा का मतलब तो बाजार होता है। अट्टा बाजार । तो पहले से बाजार है उसके पीछे एक और बाजार । बाजार के लिए इस्तेमाल होने वाला शब्द हाट भी अट्टा से ही आया है। इसलिए हो सकता है कि अट्टापीर का नामकरण भी अट्ट या अड्डे से हुआ हो। बात कहां से कहा पहुंच जाती है। बल्कि शब्दों के पीछे-पीछे अजित पहुंचने लगते हैं। वो शब्दों को भारी-भरकम बताकर उन्हें ओबेसिटी के मरीज की तरह खारिज नहीं करते। उनका वज़न कम कर दिमाग में घुसने लायक बना देते हैं। हिंदी ब्लॉगिंग की विविधता से नेटयुग में कमाल की बौद्धिक संपदा बनती जा रही है। टीवी पत्रकारिता में इन दिनों अनुप्रास और युग्म शब्दों की भरमार है। जो सुनने में ठीक लगे और दिखने में आक्रामक। रही बात अर्थ की तो इस दौर में सभी अर्थ ही तो ढूंढ़ रहे हैं। इस पत्रकारिता का अर्थ क्या है? अजित ने अपनी गाड़ी सबसे पहले स्टार्ट कर दी और अर्थ ढूंढ़ने निकल पड़े हैं। --रवीशकुमार [लेखक का ब्लाग है http://naisadak.blogspot.com/ ]


...या में जग ना समाय !

...या में जग ना समाय !

मुहावरों की गली में

मुहावरा अरबी केहौर शब्द से जन्मा है जिसके मायने हैं परस्पर वार्तालाप, संवाद।


लंबी ज़ुबान -इस बार जानते हैंज़ुबान को जो देखते हैं कितनी लंबी है और कहां-कहा समायी है।ज़बान यूं तो मुँह में ही समायी रहती है मगर जब चलने लगती है तो मुहावरा बन जाती है । ज़बान चलाना के मायने हुए उद्दंडता के साथ बोलना। ज्यादा चलने से ज़बान पर लगाम हट जाती है और बदतमीज़ी समझी जाती है। इसी तरह जब ज़बान लंबी हो जाती है तो भी मुश्किल । ज़बान लंबी होना मुहावरे की मूल फारसी कहन हैज़बान दराज़ करदन यानी लंबी जीभ होना अर्थात उद्दंडतापूर्वक बोलना।

दांत खट्टे करना- किसी को मात देने, पराजित करने के अर्थ में अक्सर इस मुहावरे का प्रयोग होता है। दांत किरकिरे होना में भी यही भाव शामिल है। दांत टूटना या दांत तोड़ना भी निरस्त्र हो जाने के अर्थ में प्रयोग होता है। दांत खट्टे होना या दांत खट्टे होना मुहावरे की मूल फारसी कहन है -दंदां तुर्श करदन

अक्ल गुम होना- हिन्दी में बुद्धि भ्रष्ट होना, या दिमाग काम न करना आदि अर्थों में अक्ल गुम होना मुहावरा खूब चलता है। अक्ल का घास चरने जाना भी दिमाग सही ठिकाने न होने की वजह से होता है। इसे ही अक्ल का ठिकाने न होना भी कहा जाता है। और जब कोई चीज़ ठिकाने न हो तो ठिकाने लगा दी जाती है। जाहिर है ठिकाने लगाने की प्रक्रिया यादगार रहती है। बहरहाल अक्ल गुम होना फारसी मूल का मुहावरा है और अक्ल गुमशुदन के तौर पर इस्तेमाल होता है।


दांतों तले उंगली दबाना - इस मुहावरे का मतलब होता है आश्चर्यचकित होना। डॉ भोलानाथ तिवारी के मुताबिक इस मुहावरे की आमद हिन्दी में फारसी से हुई है फारसी में इसका रूप है- अंगुश्त ब दन्दां ।



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